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ज़िंदगी ऐसे जिए जा रहा है जैसे गुनाह कीये जा रहा है........

कहते है वक़्त हर ज़ख्मो को भर देता है , पर कभी कभी वक़्त गहरे ज़ख्म भी दे जाता है, जो कभी नहीं भरते। उस कवी को देख के कभी कभी सोचता हूँ  कि कैसे कोई इस तरह जी सकता है, अपनों से दूर किसी वीरान  शहर में, ज़िंदगी को ऐसे जिए जा रहा है जैसे कोई गुनाह किये जा  है।  घर, परिवार भावनाये  जैसे शब्द उसको काल्पनिक लगते है , जैसे वो इन सभी शब्दों को  धीरे धीरे भूलता जा रहा है।  उसकी भूरी आँखे किसी रेगिस्तान की तरह दिखाई देती है सुखी और बंज़र , उसमे पानी का एक कतरा नहीं दीखता  वो शायद रोना भूल गया है या फिर ऐसा लगता है की उसे रोने और हसने में कोई फर्क महसूस नहीं होता। यूँ तो आत्मा अमर होती है और जिस्म नश्वर पर ऐसा लगता है कि उस कवी की आत्मा मर गयी  है और वो इस सड़े  हुये जिस्म का  बोझ उठाये घूम रहा है , जैसे की वो किसी गुनाह का प्रायश्चित करना चाहता हो। उसकी लिखी हुए कविताये और कहानियां पढ़ी है मैंने, उसमे से प्रेम की खुसबू आती थी , अब वो ऐसी कहानियां नहीं लिखता उसके लिखे हुए हर शब्द से जलते हुए जिस्म की बदबू आती है ऐसा लगता है की किसी कब्रिस्तान की सुखी हुए हड्डी से लिखी गयी हो। उसे मैंने हमेशा रात के अँधेरे में ही बहार निकलते देखा है , शायद उसे रौशनी पसंद नहीं या फिर शायद उसे अँधेरे की आदत हो गयी है या फिर शायद उसने किस्मत के फैसले के साथ समझौता कर लिया है वो समझ गया है की अँधेरा ही उसका किस्मत है।  उसे मैंने हमेशा खुद से बातें करते देखा है, वो जानता है की ना तो वो अपने मन की बात किसी को बोल सकता है और ना ही कोई समझ सकता है। सोचता हूँ की  उस कवी का अंत कैसा होगा , उसकी आखिरी कविता कैसी होगी क्या उसमे वो प्रेम के गीत लिख पायेगा या उसमे करेगा वो अपना क़त्ल , क्या वो माफ़ी के लिए मिन्नतें करेगा खुदा से या फिर देगा उस खुदा को ढेर साडी बददुवाएं।  सोच में पर जाता हूँ जब भी देखता हु उस कवी को , शायद वक़्त का दिया हुवा ज़ख्म है ये भरने वाला नहीं है।  और वो पागल कवी अपने बिना आत्मा वाले सड़े हुए जिस्म का बोझ उठाये हसते हुए जिए जा रहा है..... ऐसे जैसे कि कोई गुनाह किये जा रहा है। 

ख्वाब - जहां दर्द बिकते है !!!!!

चन्दन की खूसबू किसे नहीं पसंद , उसी खुशबू की तलाश में वो नीकल परा है उस घने जंगल में जहां सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा है , जहां के सन्नाटे शोर करते है झींगुरों के आवाज के साथ..... कभी कभी जब झींगुरों की आवाज रुक जाती है तब ऐसा लगता है जैसे जंगल सो गया है। कभी कभी उस जंगल में समुन्द्र के चीखने की भी आवाज आती है, जैसे रात के अँधेरे में पागल हुवा समुन्द्र सारे शहर वालो को बददुआए दे रहा है। ऐसे ही घने जंगल में तलाश ख़त्म होती है उसकी और उसे दीखता है चन्दन का पेड़ , वो चाहता है की उसका एक फूल तोर ले और जाकर डाल दे अपने महबूब के आँचल में , और तभी महसूस होता है उसे अपने बदन पे एक दर्द भरा कसाव , उस चन्दन के पेड़ के रखवाले सांप दबोच लेते है , वे नहीं चाहते है किसी के साथ भी उन फूलों का बटवारा।  सारे सांप अपना अपना ज़हर डाल देते है उस अभागे के शरीर में और दर्द से तरपता हुवा उसे छोर जाते है। उन ज़हरीले सांपो का ज़हर काम नहीं करता और एक का ज़हर दूसरे के ज़हर को  काटता जाता है। उन सांपो के छोटे दाँतों के छेद से रक्त का रिसाव होने लगता है और वो दर्द के आगोश में धीरे धीरे रक्तहीन होता जा रहा है, पलके बंद होने लगती है और वो खुद को मौत के बेहद करीब पाता है।  कहते है की अंत समय में सब कुछ फ़्लैश बैक में दिखाई देने लगता है , उसे भी दीखता है उसका बचपन ........ उसके घर के पास वाला बूढा बरगद का पेड़......पहली बार साइकिल चलाना........ स्कूल जाना....... स्कूल में उसे एक लडकी दिखाई देती है बहुत ही प्यारी , मगर वो हाथ छोडकर जा रही है...........जैसे जैसे समय बढ़ता जा रहा है उसकी पलके बंद होती जा रही है , फ़्लैश बैक में बहुत कुछ स्किप हो रहा है वो खुद को किसी बड़े शहर में देखता है वह उसकी महबूब उसे दिखती है, दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत लडकी........शायद उसने ब्लू कलर का ड्रेस पहना है....... शरीर का सारा रक्त लगभग ख़त्म हो गया है उसे प्यास लग रही है वो चाहता है की समुन्द्र दौर के उसके पास आ जाये और वो उसके नमकीन पानी से अपनी प्यास बुझा ले..........पलके बंद हो रही है वो देखता है की वो अपने महबूब का हाथ छोडकर जा रहा है पलट के देखता है तो उसे दिखाई देती है दर्द भरी दो आँखे जो शायद कह रही है की जाओ तुम्हे मौत कभी न मिले,....तुम इसी दर्द में रहोगे। और फिर सबकुछ शांत हो जाता है , उसे महसूस होता है अपने गालो पे गिला पानी , नींद से जाग उठता है वो उसका पूरा बदन पसीने से भरा हुआ है पर उसमे से उसे खून की बदबू आती है।  वो जलाता है उस आधी जली और आधी बुझी हुए सिगरेट को और लेता है एक बहुत ही लम्बी कश जैसे की वो आखिरी बार लगा रहा हो उसे अपने होंठो से।  सिगरेट के धुएं में उसे अपने महबूब की तस्वीर दिखाई देती है वही दर्द भरी आँखे जैसे बोल रही हो जाओ तुम्हे मौत भी नसीब नहीं होगी ऐसे ही तरपोगे तुम, तुम्हारी यही सजा है।  धीरे धीरे धुवाँ हवा में मिलने लगता है और उसकी महबूब जाने लगती है , ऐसे में बस इतना ही बोल पता है वो............... Love you too....Khyal Rakhna!!!

ज़िंदगी

ज़िंदगी बहुत याद आ रही है तुम्हारी , और ये कम्बक्त आँशु न जाने क्यों रुक नहीं रहे , ऐसे तो ये कभी निकलते नहीं , पर आज न जाने क्यों मुंबई की बारिश जैसे हो गए है। मालुम है मुझे मुझे रोता देख तुम बहुत रोती और उदाश भी हो जाती पर क्या करू ये भी मेरी तरह बेवफा है आखिर आँशु भी तो मेरे ही है इनसे क्या शिकायत करू।  तुम शायद बहुत अकेली और उदाश हो अभी और शायद इसलिए ये मेरी आँखे गीली कर रहे है। तुम्हे याद है मैंने एक बार कहा था तुम उस ब्लू वाली सूट में बहुत अच्छी लगती हो, आज भी मेरे मोबाइल के कांटेक्ट में तुम्हारा वही वाला फोटो सेव है। उस फोटो में तुम्हारा स्माइल भी काफी अच्छा है, पता नहीं भगवान मेरी सुनेगा या नहीं पर अगर सुन रहा है तो वो हसी हमेसा तुम्हारे चेहरे पे रहे। पता है कभी कभी लगता है तुम यही हो और मुझे देख रही हो, मुझसे बात कर रही हो और ढेर सारा झगड़ा भी कर रही हो और फिर अंत में हम दोनों रोते है और एक दूसरे को मनाते है। ऑफिस से घर आता हूँ तो लगता है की तुम इंतज़ार कर रही हो की मैं फ़ोन कर के बताऊंगा की मैं ठीक से घर पहुंच गया हूँ, और तुम घर पहुंची की नहीं ये जानने के लिए मन बहुत बेचैन हो जाता है, पता है तुमको कभी कभी बहुत बेचैनी लगता है बहुत परेशान हो जाता हूँ , और तुमको तो पता ही है ऐसे में मैं सिर्फ तुमसे बात करता था।  अब कोई नहीं रहता बात करने को ऐसे ही खुद को समझाना परता है। तुमको पता है मैंने गजल सुनना बंद कर दिया है, आज कल नहीं सुनता, पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगता। आज कल ऐसे ही Youtube पे कुछ कुछ देखता रहता हूँ कुछ खास पसंद का वीडियो नहीं है बस ऐसे ही कुछ भी देख लेता हु। देखो ना फिर से तबियत ठीक नहीं लग रहा है , सोच रहा हु की थोड़ी देर सो लू नींद तो नहीं आएगी पर कोशीश करता हु।  तुम ठीक हो ना ? पता है मुझे अगर मैं ये पूछता अभी तुमसे तो तुम यही बोलती की "ज़िंदा हु ", ऐसा मत बोला करो प्लीज, बहुत दर्द होता है..... ख्याल रखो अपना।

तुमने ये गुलज़ार की नज़्म पढ़ी है क्या ?
Aaj phir chaand ki peshani se uthta hai dhuan
Aaj phir mehki hui raat mein jalna hoga
Aaj phir seene mein suljhee hui vazni sansein
Phat ke bas toot hi jayengi, bikhar jayengi
Aaj phir jaag ke guzregi tere khwaab mein raat
Aaj phir chaand ki peshani se uthta hai dhuan
Aaj phir mehki hui raat mein jalna hoga 

A unique fondness.......

आज बहुत दिनों बाद हिंदी लिखने बैठा था पता चला की मैं हिंदी लिखना भूल गया हूँ , ठीक वैसे ही जैसे जीना भूल गया हूँ। सोच रहा हूँ की कोई काले कागज वाला नोटबुक खरीदू और कब्रिस्तान की सफ़ेद हड्डी से लिखुँ उसपे कवितायेँ जो अक्सर मैं लिखता रहता हूँ अपने ख्वाबों में, जब नींद से चल रही होती ही लड़ाइयां काली अँधेरी मगर शोर करती हुए रातों से।  लिखुँ उसपे वो सारी नज़्में जो अक्सर जेहन में आती है मेरी, जब जब सिगरेट के धुएं में तुम्हारी शूरत नजर आती है।  उस काले कागज के ऊपर मैं लिखना चाहता हूँ इबादतें शैतान के लिए और लिखना चाहता हूँ ढेर सारी बददुवाये ऊपर वाले के लिए जिसने ये सारी दुनीया बनाई है। मैं उस काले कागज के ऊपर अपनी नाकाम्यबिनाँ लिखना चाहता हूँ, तुम्हारी हँसी लिखना चाहता हूँ , अपने आंशू लिखना चाहता हूँ, और सबसे अंत में चाहता हूँ की लिखू......................ख्याल रखना..............Love you too

दुख के समुन्दर में डूबती कागज की कश्ती......

बचपन में बनाना सीखा था उसने कागज की नाव, बारिश में मौसम में जब आँगन पानी से भर जाता था तब तो बनाता था कागज की नाव और छोर देता था उसे तैरने के लिए वो नाव तब तक तैरती थी उस आँगन में जब तक बारिश की मोटी मोटी बुँदे डूबा न देती थी उसे, बचपन का चंचल मन कुछ समय बाद भूल जाता था उसे नाव को।  आज भी कही न कही उस नाव की यादें बसी हुई है उस कवि के मन में।
कही पे शायद पढ़ा था की अगर जीवन में दूख ना हो तो सुख की अनुभूति नहीं की जा सकती, पर अगर दूख रेल की पटरी की तरह हो तो ?? अगर दूख मैथ के इन्फिनिटी की तरह हो तब क्या ? मैथ में पढ़ा की अगर  किसी चीज को जीरो से डिवाइड किया जाये तो इंफिनिटी होता है, तो फिर ऐसी कौन  चीज है जिसे जीरो से डिवाइड किया जा रहा है , मैथ हमेशा की तरह फिर से कोम्प्लिकेटेड हो गया।
मुट्ठी से फिसलते हुए रेत की तरह ज़िंदगी फिसलती जा रही है, साँसे क्यों चल रही है कवि समझ नहीं पाता , हर रोज़ उठ के सोचता है की आज बेहतर होगा , पर वो आज कभी नहीं आता, और फिर वो एक दिन गुजार लेता है बिना कोई सवाल किये हुए।
अध जगे नींद में वो देखता है अनंत सागर को, जो कभी   बेहद शान्त तो कभी बेहद तूफानों से घिरा हुवा दीखता है , और पाता है खुद को लहरों के ऊपर, हर पल उसे लगता है की वो डूबने वाला है पर वो डूबता नहीं , वो चाहता है की वो खुद को समुन्दर के हवाले कर दे पर समुन्दर उसे कबूल नहीं करता और लहरो के सहारे उसे किनारे पे पटक देता है, नींद खुल जाती है उसकी और वो महसूस करता है रेत की खूश्बू जो कीनारे पे लग गई थी शायद।  उसने ज़िन्दग़ी के हर पल को हंस के जिया था और आज ज़िंदगी जैसे नासूर बन के रह गई है , जिसे अलग करने पे भी दर्द होगा और अगर वो जुड़ी रही तब भी तकलीफ देगी। पता नहीं ये अधूरा सफर कब अपने मुकाम पर पहुंचेगी, बस जिए जा रहा है.......... एक सफर है जो तय करना है उसे.. . . . . . . . . कभी कभी वो खुद को उसी बचपन की नाव में बैठा हुवा महसूस करता है , फर्क बस इतना दीखता है की वो नाव किसी आँगन के जमे हुए पानी में नहीं बल्कि दूख के अथाह समुन्दर में तैरती दिखती है. . . . . . . . . इंतज़ार बारिश की उन मोटी बूंदों का है जो नाव को डुबो दे और वो अंत करे इस सफर का.........बस उसे इतना वक़्त चाहिए नाव के डूबते समय की वो सज़दा कर पाये अपने खुदा की आखिरी बार... . . . दुवा मांग पाये उसकी सलामती की, शुकुन मिल जाये उसे और कर पाये वो सबको अलविदा हमेशा  के लिए!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

आत्मदाह

मैंने कई बार देखा है उसे ठिठुरती रात में छत पे बैठ के सितारों को निहारते हुए, ना जाने क्या बातें करता है वो उन सितारों से शायद कुछ समझाना चाहता है उन्हें, या फिर करना चाहता है कोई ऐसी बात जो बोल नहीं पता कभी. न जाने कौन सा दर्द लिए जिए जा रहा है वो ,की  सारी मधुशाला पी के भी उसकी प्यास नहीं बुझती । अपने ही धून में रहता है वो , कभी किसी से बात नहीं करता , कैसे जी सकता है कोई इन्शान ऐसे.…रात के अँधेरे में कई बार मैंने महसूस की है उसकी शिशकिया, सुन के ऐसा लगता है जैसे उसकी आत्मा किसी बोझ से दबी हुए है, एक दो बार राह चलते मिला हूँ  उससे उसकी आँखे बहुत डरावनी है बिलकुल खामोश , जैसे लाखों तूफ़ान अपने अंदर दबाये हुए हो. पूरा दिन घर में बंद रहने से उसका शरीर पीला पर गया है, बहुत कम  निकलता है वो अपने घर से, कभी किसी को नहीं देखा उसके घर में आते-जाते , शायद कोई दोस्त नहीं है उसका इस शहर में, बिलकुल अकेले जिए जा रहा है वो अभागा इन्शान।  बस एक-दो बातें है जो हर दिन देखने को मिल जाती है, आधी रात को कही से लरखाराते हुए आना,रात में सितारों को देखना और फिर वो दर्द भरी शिशकारिया।
ऐसे तो मैं संडे को बहुत लेट से उठता हूँ , पर आज उठना पर, न जाने कौन बहुत देर से कॉल बेल्ल बजाये जा रहा है।  गेट खोल के देखा तो वही अभागा इन्शान था, माफ़ी मांगते हुए उसने किसी मंदिर का पता पूछा और चला गया, कुछ अजीब सा लगा. मैंने भी अपनी चाय पी और सोचा चलो मंदिर हो के आता हू इसी बहाने अगर वो मिला तो कुछ बातें भी हो जाएँगी और उसको जानने का मौका भी मिलेगा, इतने दिनों बाद बात की है शायद दोस्ती करना चाहता होगा। मंदिर के पास में एक छोटी सी नदी है , लोग कहते है की वो गंगा का हिस्सा है, मंदिर पहुंच के देखा तो वो नदी में खरा हो के कुछ मंत्रो का उच्चारण कर रहा था, मैंने सोचा की चलो अच्छा है शायद ये अपनी ज़िंदगी की नई शुरुवात करने वाला है,
शायद उस दिन अमावश था.,,,,रात बिलकुल काली और डरावनी थी.… लैंप पोस्ट की रौशनी में मुझे फिर से वो छत पे दिखाई दिया लेकिन आज वो ज्यादा देर तक रुका नहीं वह और जल्दी ही चला गया.…रात बहुत ही डरावनी प्रतीत हो रही थी और नींद मेरी आँखों से कोशो दूर थी.… पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था की मुझे उससे जाकर मिलना चाहिए ……पता था था मुझे की ये सही समय नहीं है किसी के घर जाने का फिर मैं खुद को रोक नहीं पाया और उससे मिलने चला गया उसके घर..... जाने किसका इंतज़ार था उसे घर के दरवाजे खुले रखे थे उसने और सारे लाइट्स ऑफ थे, लाइट्स ओन कर के देखा तो वो अपनी हॉल के सोफे पे लेता पर था, चारो तरफ जैसे खून ही खून था, उसने अपनी नब्जे काट ली थी, और रुक्सत ले लिया था इस दुनिया से। बाद में पुलिस आई  उसके  घर की तलाशी ली गए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे उसकी पहचान होती, बस एक डायरी मिला जिसमे उसने कैद की थी कुछ चंद यादें ,एक लावारिश मौत मिली थी उसको, इससे बढ़कर और बुरी किस्मत क्या होगी जब किसी की लाश पे लिपट के रोने वाला भी कोई न हो.....उसकी  डायरी के कुछ आखिरी पन्ने पढ़े थे मैंने, हर एक लाइन उसके दर्द को बयां कर रही थी........ कुछ ऐसा लिखा था उसने
"
क्या कभी देखा है तुमने किसी को बार-बार  मरते हुए, मैं मर रहा हूँ  हर पल,हर दिन, हर लम्हा, कई बार तो अपना श्राद्ध भी किया है मैंने ..........तुमसे दूर जाने का दर्द और जीने नहीं देता जान, शायद यही सजा है मुझे जैसे अभागे की.…आज फिर से कर रहा हु अपनी आत्मा का दहन, फिर से मर रहा हु मैं और कर रहा हु अपना श्राद्ध,……तेरा प्यार, तेरा दर्द, तेरा गम ओह........ बहुत दर्द है जान.…ज़ब ना रहू तो एक दीप जल देना उस पत्थर के आगे जहा माँ की ममता मिलती थी मुझे , दो आँशु बहा देना और वापस चली जाना......उतना बुरा भी मैं नहीं था जितना तुमने सोचा था.…अब वक़्त हो चला है अलविदा करने का.………ख़याल रखना।
"
अगले दिन वापस मदिर गया मैं.....शायद शांति चाहिए थी मेरे मन को.…मंदिर में वही मंत्र सुनाई दिया जो कल वो अभागा इन्शान पढ़ रहा था नदी में खरा होकर। पास जाकर देखा तो कोई पंडित थे, जो किसी का श्राद्ध कर रहे थे ठीक उसी जगह खरे होकर जहा कल वो खरा था।
अभी समझ में आया की वो कल अपना श्राद्ध कर रहा था, उसे पता था की कोई नहीं करने वाला उसका श्राद्ध, कोई नहीं आने वाला उससे लिपट के रोने , कोई नहीं है किसे फर्क परता है उसके होने या ना होने से.………
अब रात को कोई छत पे नहीं दीखता ना ही वो दर्द भरी शिश्कियां सुनाई देती है.…फ़िर भी हर रात याद आता है वो अभागा इन्शान जिसने बिना किसी को कुछ कहे अलविदा कर दिया सबको, जिसने कर दिया अपना आत्मदाह .......... और याद अाता है उसके वो  मंत्र जो पढ़े थे उसने आखिरी बार !!!!!!!
"नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः"

कुछ तुम्हारे लिए !!!!!

ज़िंदगी जब खेलने लगती है जिस्म के इस खिलौने से , जब हर एक सांस लेना भारी परने लगता है इंसान को ऐसे में दर्द का मारा कवी मैखाने नहीं जाये तोऔर  कहा जाये।  थके हुए दिमाग और सरे हुए जिस्म का बोझ उठाना कितना भारी होता है कोई उस कवि से पूछे जिसने दर्द के कहर से अपनी सबसे प्यारी चीज, अपनी कलम को फेंक दिया है काफी पहले। फिर भी लिखना चाहता है अपनी दास्ताँ और बनाता है किसी कब्रिस्तान की हड्डी को अपना कलम और काट लेता है अपनी नब्ज़ों को, लिखने बैठता है अपनी दास्तान। लाखों शिकायते लिखी जाती है अपने खुदा के लिए, गलियां लिखी जाती है दुनिया के रस्मों रिवाजो के नाम........लिखी जाती है हर उस जुर्म की दास्तान जो उसने किया है अपने महबूब के ऊपर जाने-अनजाने में। एक - दो नब्ज़ उभरते है उसके महबूब के नाम जहा लगाई जाती है गुहार अपने माफ़ी की.…खून जब काम परने लगता है जिस्म की और पलके बंद होने लगती है तो लिखता है आखिरी लाइन अपने खूबसूरत साथी के नाम और बंद कर लेता है अपने नजरें......
Love you too
Khyal Rakhna!!!!!

नाकाम वफ़ा

आज फिर डूबेगी कलम मेरे काले खून में और निकलेंगे कुछ अल्फ़ाज़ जो धीरे धीरे मारते जा रहे है मुझे, ठीक वैसे ही जैसे काटता है लकरहारा किसी पेड़ को. काले खून से लिखी जाएँगी मेरे नाकाम वफ़ा की चंद बातें…जिसने रुलाया है तुमको दिन रात…जिसने बना डाला है तुमको मज़ाक का सामान सबके लिए. सुना है हर कर्मो की सजा देता है खुदा , खुद का दीदार कराने से पहले, मेरी क्या सजा होगी ये तो नहीं जानता पर सजा तो मिलनी ही है.
खवाहिश थी की हसते हसते विदा करूँगा सबको, पर अब ये मुमकीन नहीं है.......... तेरी सजा काटना भी बाकी रह गया मेरी जान............. बस एक और आख़िरी एहशान कर देना अपने आशीक पे , जब सब रो रहे हो मेरे सीने पे सर रख के, एक आखिरी बार आना मिलने और लगा लेना गले से अपने , की  रूह को थोड़ा शुकून मिल जाये शायद और मिल जाये हिम्मत खुदा के कहर से लरने के लिए . 

खंजर

लरकी देखती है अपने आशीक  को सोते हुए , बहुत प्यार करने  का जी करता है उसे और तभी उठाती है खंज़र और भोंक देती है अपने आशीक के सीने में , उसे मंज़ूर नहीं है उस दील का धरकना जीसने उसे धोखा दीया............लरका खोलता है अपनी आँखों को,लहूॅ सी लाल आँखे.........होंठो पे  मीठी पर दर्द भरी हंसी लीये विदा करता है अपने महबूब को और मूँदता है पलकों को आखिरी बार।  शुकुन  से भरा हुवा और शांत परा चेहरा जैसे बोलना चाह रहा हो शुक्रिया मेरी जान , इतनी देर क्यों कर दी 
लरकी खामोश बैठे देखती है कूछ पल को और फीर चूप - चाप चली जाती है कही, अपने आशीक के माथे पे प्यार की एक निशानी छोरकर...........और उसे सुनाई देता है कुछ अनकहा सा..........जैसे कोई बोल रहा हो 
"लव यू टू , ख्याल रखना !!!!!!!!!!"

ताश के पत्त्तों का घर

बना रहा था एक घर मैं ताश के पत्त्तों का, बहुत बार टूटा और फिर से जोड़ी मैंने साड़ी दीवारें की हार मानना मेरी शक्शियत में शामिल नहीं था। बार नार हवा के झोंको से गिरता रहा मेरा घरौंदा और मैं इस भरम में की एक रोज घर बन जायेगा जोरता रहा दीवारें। हर शख्स ने देखा मुझे घर बनाते और हसते रहे मेरी गरीबी पे, तमाशा बना मेरे जज़्बातों का और बदनाम हुए मेरे सपने। हार्ट कलर के क्वीन को कभी यूज़ नहीं किया मैंने दीवारों में, बचा के रखा था उसे की सजाऊंगा उसे अंदर वाले कमरे में।  तैयार होने की हो था घर मेरा की वक़्त ने दिखाया अपना खेल फिर से, बन के आया तो वो चक्रवाती तूफ़ान, जो ले के उर गया सरे पत्त्त्तो को................
टेबल पे देखा तो एक ही पत्त्ता उल्टा परा हुवा दिखा.... पलट के देखा उस आख़िरी पत्त्ते को.... ताश के पत्त्तों का सबसे अनोखा पत्त्ता था वो… जोकर !!!!!!
बहुत देर तक देखता रहा उस आखिरी पत्त्ते को.…और नजर पारी सामने के आईने पे, ढूंढ रहा था उस आखिरी पत्त्ते को आईने में और नजर आया एक मायूस और हारा हुआ  सा चेहरा................... कमरे में बस दो ही बच गए थे उस तूफ़ान के बाद.…… ताश के पत्त्ते का जोकर और मैं!!!!!!!!!!!!!!!

आखीरी सिगरेट !!!!

रात के अँधेरे में जब सो जाती है सारी दुनीया , जब फ़ैल जाता है सन्नाटा चारो तरफ और सुनाई देने लगती है घरी की टिक-टिक और झींगुर की आवाजे , ऐसे में सो जाता है कवी घर की किसी दीवार को देखते हुए। सपने में देखता है सूखते हुए समंदर को, की जिसमे से फसाई है मछुवारे ने कुछ मछलिया और जाल को फेंक दिया है सूखे हुए रेत  पे.ज़ो न पूरा सुखा हुवा है न पूरा गीला। तरप रही है मछली पानी के लिए और  सुलगा रहा है अपना सिगरेट वही पास में बैठा हुआ मछुवारा , और जाल में फंसी मछली सोच रही है की वो जाये तो जाये कहा. यूँ तो पास में ही समंदर है, पूरा भरा तो नहीं पर उतना सुखा भी नहीं की मछली जी न सके उसमे।।।।पर कुछ यूँ फंसाया है मछुवारे ने की जाल में फंसी मछली निकल नहीं सकती, और रेत भी उतनी गीली नहीं की वो सांस ले सके , कुछ यूँ तरप है की  वो की दुवा मांग रही है अपने मौत की, खुदा तू तो बहुत रहम दिल है .....क्यों  तरपा रहा है उसे जबकि अब ये निश्चित है की उसे जाना है फिर इस तरप की वजह क्या है.... क्या इतने पाप किये है इस मछली ने.…मत तरपा उसे की अब वो सांस नहीं ले पा रही.……दिल बाहर निकल रहा रहा है.… सुना है की हर ज़र्रे ज़र्रे में तू रहता है फिर देख के अनदेखा क्यों कर  रहा........... चीख निकलती है मछली की और जाग उठता है कवि.…………सपने का ही असर होगा शायद महशूस करता है खुद को किसी जाल में फंसे हुए.… सजदा करता है उस रहम दिल की और मांगता है दुवा अपनी मौत का.……… अँधेरी रात और ऐसे सपने।।।शुकुन  कहा मिलेगा उसे.…अब थक सा गया है कवि नहीं चाहता देखना कोई और सपना............बस कुछ सवाल , कुछ जबाब , कुछ बेबसी ,कुछ मज़बूरी , कुछ नाराजगी लिए रुख्शत होना चाहता है.…और चाहता है जलनी आखिरी सिगरेट , जो जल नहीं रही आसानी से, लाइटर जला नहीं पा रहा शायद या जलना नहीं चाहती वो छोटी से सिगरेट, शायद उसको भी पता है की ये आखिरी मिलन है मेरा!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


याद आता है कवि को कही पढ़ी हुई कुछ पंक्तिया.....................
मोमबती की बुझती लौ से जलाई जा रही है आखिरी सिगरेट..............जिसके कश लेकर मर जाना चाहता है कवि!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

ख्याल रखना !!!!

बहुत लम्बा चला था उनदोनो का call आज. लडकी के पास बोलने के लिए बहुत कुछ था , बिखेर के रख दिए उसने अपने सारे जज़्बात …और लड़का चूप चाप सुनता रहा , यूँ तो कहने के लीये बहूत कूछ था लड़के के पास भी , लेकिन क्या कहता.....लड़की कूछ गलत भी तो नहीं कह रही थी. लड़का जानता था की वो बहूत उदाश है , रो  रही है........ पर वो चुप रहा, कुछ नहीं कह पाया ,,,,,या शायद चाहता था की लड़की उसकी ख़ामोशी सुन ले बिना कुछ कहे. जाने कीस उलझन में परा था.
वो चाहता था की बता दे उसे की वो कितना चाहता है उसे, की उसके बीना उसे खुद का अस्तित्व नहीं दीखता , की उसके सीवा कोई और उसे अच्छा नहीं लगता , की सुबह में उसी के ख्याल में उठता है ये जानने के लिए की क्या उसकी नींद पूरी हुईं और रात ढलती है इसी ख्याल में की क्या वो सो रही होगी, बोलना चाहता था उसे की तुम्हारे लिए तो मैंने खुशिया ही खुशियां मांगी थी मेरी जान,और तुम्हारे आँखों में मेरे ही नाम के आँशु बह रहे है, और उन आंशुओ के साथ साथ.......वो भी गिरता जा रहा है, किसी सागर के पेट में....जैसे डूब के रह जाना है वही पे. 
जाने ऐसे ही कितने ही अनगिनत ख्याल और अनकहे सवालो के तूफ़ान में भूल गया की Call के अंत में वो क्या बोला था .…कूछ ठीक से याद नहीं की कब बोला था,फ़ोन रखने के पहले या बाद में..... पर इतना याद है कहा था की खूश रहना......ख्याल रखना



ठीक उसी वक़्त कही गुलजार की ये नज़्म बज रही थी :
Ek Sannata bhara hua tha ek gubbare se kamre me,
Tere phone ke ghanti ke bajne se pahle
Baasi sa mahaul ye sara, thodi der ko dharka tha
Saans hili thi,nabz chali thi
Mayusi ki jhilli aankho se utri kuch lamho ko
Fir teri aawaj ko aakhiri baar khuda hafiz karte jate dekha tha
Ek Sannata sa bhara hua hai,zism k is gubbare me..tere phone ki aakhiri phone k baad

Keyboard ke Alphabets aur Zindgi

कभी कभी ऑफीस के काम से बोर होकर जब अपने प्यारे से लैपटौप के कीबोर्ड को देखता हू तो ख्याल आ जाता है अपनी जिंदगी के बारे में ,  कीबोर्ड के अल्फाबेट्स की तरह बिखरे परे सपने याद आ जाते है। जो यहाँ वहाँ  परे हुए है , और मैं बेबश इतना की इनको सजा भी नहीं सकता, सजाने पर बहुत कूछ टूट जाने का डर है।

कुछ Keys तो ऐसे भी है जिन्होंने बहुत दुरीयां बना डाली है मेरे बनाये हुए  हर डाक्यूमेंट्स में जिसे बनाया था मैंने सपने देखते हुए.। ये जो एंटर , टैब ,और स्पेस बार है ना , बहूत बार दबाया है शायद इनपे मेरी अँगुलियों के नीशान साफ़ दीखाई देते है. एक एस्केप बोल के छोटा सा Key, दीखता है कोने में , बिलकुल नया सा दीखता है, शायद मैंने उसे यूज ही नहीं कीया है कभी।
कूछ तो ऐसे भी Key है जो बील्कुल काम नहीं करते ये जो F1 है, जीसे दबाने से छोटा सा विन्डो खुलता था , जो मदद करता था हर प्रोग्राम्स को समझने में , काम नहीं कर रहा , कितना भी दबाऊ कूछ हलचल नहीं दीखता मेरे स्क्रीन पर और F5 भी काम करना बंद कर दीया है. 

शायद इसे भेजना होगा वापस डेल के ऑफीश , जहा इसे बनाया गया था.… शायद कूछ पुर्जे खराब हो गये है इसके या पता नहीं क्या हुआ होगा........

इंतज़ार और सही....

कल रात चाँद बहूत उदास था शायद
बादलो से कूछ पानी की बुँदे टपक रही थी 
खीरकी से जो हवा का झोंका अंदर आया 
उसमे कूछ जलने की बू आ रही थी 
कीसी का दील जला होगा कही 
या कीसी ने कोई सिगरेट जलाई होगी 


तुम्हे पता तो है ना की हर पल रहता है इंतज़ार तुम्हारा 
तुम्हारे ना होने पर भी,  सुनाई देती है तुम्हारी खामोशियाँ 
घरी की टीक - टीक  की तरह 
सिगरेट के धुएं में भी तुम नजर आ जाती हो 
जानता हूँ नहीं है पसंद तुमको, मेरा इंतज़ार करना 
रहना चाहती हो मुझसे दूर 
डर भी लगता होगा , तुम्हे मेरी बातों से 
पर फीर भी.… तुमको पता तो है ना.... 
की हर पल रहता है इंतज़ार तुम्हारा 


सोचता हूँ की लीखूं एक आखिरी खत 
किसी अनजाने से शख्स को 
जो जानता नहीं हो मुझे 
और बिखेर के रख दूं , सारे ख्यालात 
जो दर्द देते रहते है मुझे 
जिनसे जितना दूर जाऊ , उतना ही पास आते रहते है 
और उस खत को बहा दू सागर में 
किसी बोतल में बंद करके !!!!!!!

घर के सामान

सुरज के सो जाने के बाद , जब घर वापस जाता हु
तो होता है अहसास कुछ बिखरे , कुछ खोए सामानो का
वो सामान जिसे बडे  प्यार से सजाया था मैने
कुछ छोटे बडे गुल्दस्ते , जीसमे से हमेशा खूशबू आती थी
कुछ इस तरह बिखरे पडे  है सामान
कि अब कांटे अलग और फूल अलग है गुल्दस्ते से
वो खत जिसे कई कई  बार पढ़ा है मैने , लिफाफे से गायब है
डायरी के बीच मे परा ये खाली लिफाफा , बहुत याद दिलाता है उस खत की
वो आवाज भी अब कभी महसुस नही होती
जो हमेशा खिलखिलाती रहती थी, मेरे घर के अन्दर ख्यालो मे
ना जाने कहाँ खो गई है वो आवाज
एक छोटा सा बैग था मेरे पास
जिसमे सहेज कर  रखे थे मैने सारे किमती सामान
बस कुछ निशानियाँ ही बच गए है उसमे
एक भी समान किमती नही दिखता
कुछ तारिखे हूवा करती थी, बहुत खास तारीखे
दीवार मे लगे कैलेन्डर से वो भी गायब रहते है अब
हा, कभी कभी दिख जाते है,लेकिन बहुत खोजने पर
सूरज के सो जाने पर , जब घर वापस जाता हू
खोजना चाहता हु , सारे खोए सामान
सजाना चाहता हु घर अपना
पर अन्धेरे मे करु भी तो कैसे
शायद घर बिख्ररा ही रहेगा अब
शायद कोइ समान नही मिलने वाला है मुझको
जो खो गया है शायद वो मेरा था ही नही.…… 

"My First Story"

My First Story, don’t know what to write how to write. I am very afraid about my first story, perhaps it’s not going to find any end :)



विस्की के ग्लास में धीरे धीरे पिघलता हुआ बर्फ और हाथ में जलता हुआ सिगरेट , ना जाने किसकी सोच में गूम था की वो भूल गया था सिगरेट का कस लेना । सामने के टीवी स्क्रीन पे कभी आईपीएल तो कभी पॉलिटिक्स के न्यूज़ बार बार बदल रहे थे पर इन सब से बेखबर वो किसी और दुनिया में गूम था । ग्लास में पिघलता हुआ बर्फ भी अपना दम तोर चूका था , सिगरेट  के दुसरे किनारे पे जलता हुआ आग जब उसके उंगुलियों को छुया तब वापस आ गया अपनी दुनिया में . सामने के  फ्रीज से 2-4  आइस क्यूब अपने ग्लास में  मिला के, वो दूसरा सिगरेट  जलाने लगा . उसे समझ में नहीं आ रहा था की उसने जो किया वो सही था या गलत. इसी सवाल का जबाब ढूंढते ढूंढते वो 4-5 पेग पि चूका था . शायद अल्कोहल का असर होगा की उसे इतना टाइम लग रहा था खुद के फैसले को जज करने मे. 2 पेग और लगाने के बाद उसने दूसरा सिगरेट जलाया आर वापस चला गया अपनी दुनिया में जहा उसे ये जानना था की उसने जो भी किया वो सही था या गलत .
कभी कभी हम जिंदगी से बहुत उम्मीद कर लेते है , और सारी  उम्मीदें ना पूरी होने पर इतने निराश  हो जाते है की लगता है कुछ पाया ही ना हो. सब कुछ तो था उसके पास , एक हँसता हुआ परिवार माँ पापा बहन भाई  और वो जिसे वो खुद से ज्यादा प्यार करता है उसका प्यार पूजा . शायद किसी ने सच ही कहा है शराब पिने से गम भुलाया नहीं जाता बल्कि और बढ़ जाता है दर्द , जो सवाल हम ज़माने से करना चाहते है खुद से करने लगते है. उसे खुद की मनोदशा समझ में नहीं आ रही है  .ऐसा लग रहा है जैसे वक़्त पीछे ले जा रहा है ऐसा लग रहा है जैसे वो वापस बचपन में लौट गया है , या शायद उसने ज्यादा पि ली है. उसे लग रहा है कोई उसे बुला रहा है, शायद माँ बुला रही है…. निशित उठो ....निशीईईइत ....बेटा स्कूल नहीं जाना है ,उठों .......

भारत देखो अब रो रही है

भारत अपने बेटों को ममता की दुहाई दे रही है
मेरे वीरों अब जग जाओ , इंसानियत यहाँ पे खो रही है
नहीं बचा यहाँ कोई सुभाष , बचा न कोई गाँधी है
कौन संभालेगा मेरा आँचल
हर मोड़ पे धूलों से भरी यहाँ आंधी है
हर तरफ शकुनि घूम रहे है
धृत-राष्ट्र  ने आँखों पे पट्टी लगाई है
कृष्णा भी नहीं है अब बोलने वाले
इज्ज़त दांव पे अब बन आई है
भगवान् का भी नहीं है डर  उसको
उसने बच्ची की निर बहाई है
हे शिवाजी तुम उठा लो हथियार
या गाँधी तुम ही आ जाओ  
कुछ भी हो तरीका चाहे ,
मेरी लाज बचा जाओ
भारत देखो अब रो रही है
कहा गए सब यहाँ के वीर ????

Solitary Night

Amongst the sadness and stillness of the night
He stood there watching the white moonlight
With an imagination of being questioned "why are you staring at me"
Just an imagination perhaps
He was searching in his own strange ways, for her, in the moon
Was the answer he answered to himself?
Was cloudy that night, the motion of the clouds often disturbing him
Swaying him away from his aim, till he was determined
He spent that night staring and seldom complaining to the clouds
Wishing both of them to be left alone
It seemed to be now a favourite past time for him, with each night getting darker
The clouds reducing (which he considers a good sign) and the moon getting brighter
As if both of them communicating better than the night before
A night came when the moon was full,
With twinkling stars filling up the night sky
And no clouds that night..
It seems he is happier at least the sky is wishing the same
He met her tonight
There were so many nights he couldn't sleep, because of those dark nights,
But tonight was so better, happier than ever before,
As if he was so very near to his aim, 'To Her',
He just could not rest his eyes.
They met again the next evening,
It was a very different day with rain drops splashing against their faces,
Dark grey clouds all over the sky
Both of them dreaming into each other’s eyes,
Lost amongst themselves, wishing that the evening never comes to an end,
Everything including 'Her' remains the same.....

एक शून्य में खोया हुआ

एक शून्य में खोया हुआ अनजाना सा मैं
जैसे कुछ ढूंढ़ रहा हूँ
की कही मील जाये शायद वो 
की जिसने सिखाया था प्यार करना मुझे
की जो मेरे ही रूह में बस गयी थी कभी
की जिसको देखने की लालच में
आँखों ने सोना छोर दिया था
एक शून्य में खोया हुआ अनजाना सा मैं
जैसे कुछ ढूंढ़ रहा हूँ
की कही मील जाये शायद वो
की जीसके एक आंशु के टपकने पे
पुरे दुनिया को जलाने  का दिल करता था
की जिसके एक मुस्कुराने पे
जिस्म की थकान दूर हो जाया करती थी
की जिसके साथ नहीं होने पर भी
उसके यादों की महक बिखरती रहती थी
एक शून्य में खोया हुआ अनजाना सा मैं
जैसे कुछ ढूंढ़ रहा हूँ
की कही मील जाये शायद वो
की जो मेरे बुलाने पर भी
अब मेरे पास नहीं आती
की जो अब समझ नहीं पाती
मेरे जुबान की बातें
की जिसने मेरी ख़ामोशी सुन के
मुझसे प्यार किया था कभी
एक शून्य में खोया हुआ अनजाना सा मैं
जैसे कुछ ढूंढ़ रहा हूँ
की कही मील जाये शायद वो



एक चौराहे की कहानी

उस चेहरे को देख कुछ यूँ लगा
कोई लम्हा याद आया हो जैसे
हाथों में कुछ खिलौने , बदन पे अध् फटे से कपडे
चेहरा जैसे धुप को ललकार रही थी
और आँखे गाड़ी के भीतर बैठे मेम साहब को देख रहे थे
होठ सूखे हुए पर दिल में एक उम्मीद
कोई खिलौना अगर बीक जाता तो पेट की आग को बुझा लेती

बड़ी करुणा भरी थी उसकी आँखे
पर आँखों से क्या होता है
उसके ऊपर माथे की लकीरों को कौन बदल पाया है
उसके हर नजर में एक प्यास थी
और उस चौराहे के लोगों की नजरों में भी कोई प्यास था

समय के साथ बढ़ता बदन , और छोटे होते हुए कपडे
चाह के भी खुद को नहीं छुपा पा  रही थी वो
और हमारे समाज के ताज कहलाने वाले अपनी किस्मत पे इठला रहे थे
सबकी नजरों के घाव को झेल रही थी वो
और दिल जैसे सोच रहा था , की किसको दोश दे
उस खुदा को जिसने ऐसा किस्मत लिखा
या उस कलम को जिससे खुदा ने उसका किस्मत लिखा था कभी

बरी  मुश्कील  से नजरो को छुपा रही थी वो
बरी मुश्कील  से दामन बचा रही थी वो
नहीं चाहती थी की खड़ी रहे उस मोड़ पे मगर
मजबूरीयों का सीतम उठा रही थी वो

चाह के भी तब दे न पाया था एक सिक्का मैंने
पेट थे मेरे भरे , और उसको रखा तब भूखा मैंने
दुनिया को शायद पहली बार मैंने समझा था उस दिन
पैसे की कीमत को पहली बार था पहचाना मैंने

गाड़ियों के भीर में वो आज भी कही खड़ी होगी
लोगों की नजरे उसपे आज भी कही गडी होंगी
आज भी कही धुप में वो , पसीने सुख रही होगी
आज भी किसी मोड़ पे वो अपना दामन बचा रही होगी

आज भी उसको देख के कोई दिल रोया होगा
आज भी उसको देख के कोई रात भर ना सोया होगा .......